सांस्कृतिक वैविध्य

सांस्कृतिक वैविध्य

भारत के नक्शे में बिल्कुल बीचो-बीच विराजमान मध्यप्रदेश को देश का हृदय स्थल कहा जाता है। अभी हाल-हाल तक यानी छत्तीसगढ़ के पृथक राज्य बनने के पूर्व तक इस प्रदेश की सीमा अन्य सात राज्यों को छूती थी। वर्तमान में यह पाँच राज्यों की सीमाओं को छूता है। सांस्कृतिक रूप से यह निश्चित ही एक अनुपम वरदान है। मध्यप्रदेश में जो सांस्कृतिक वैविध्य देखने मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। राजनैतिक सीमाओं से लगभग बेखबर राज्यों के सीमान्तों में रहने वाले समुदायों के बीच परस्पर भाषा, खान-पान, रहन-सहन, गीत-नृत्यों आदि का सांस्कृतिक विनिमय अनवरत् रूप से चलता रहता है। यह दो तरफा विनिमय दोनों को समृद्धतर बनाता है।

मध्यप्रदेश की इस विशिष्टता को स्थापित करने तथा उसकी बहुरंगी, बहुआयामी संस्कृति को बेहतर रूप से समझने और दर्शाने का कार्य दीर्घा क्रमांक-एक में किया जायेगा। गैलरी के स्वरूप को इस तरह से विकसित किया जायेगा कि आने वाले दर्शक के मन में मध्यप्रदेश की वटवृक्षीय सांस्कृतिक उपस्थिति स्वत: स्फूर्त रूप से छा जाये। जैसे वटवृक्ष की डगालें व जड़ें दूर-दूर तक फैलती जाती हैं और किसी निर्धारित सीमाओं में बँधकर नहीं रहती, ठीक ऐसे ही स्वरूप में मध्यप्रदेश की विभिन्न जनजातियों की संस्कृति को रूपायित किया जायेगा। सीमाओं के पार अपने पड़ौसी राज्यों में रहने वाले समुदायों में इनकी सांस्कृतिक डगालें या जड़ें कैसे फैली हैं, इस बात का दर्शक यहाँ प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे। दीर्घा के स्वरूप की संक्षिप्त स्थिति कुछ इस तरह से होगी।

दीर्घा के समूचे मध्य भाग में मध्यप्रदेश के मानचित्र का कुछ ऐसा आभास खड़ा किया जायेगा, जिसमें उसक भौगोलिक कनटूर्स, पहाड़-पठार, जंगल तथा जीवनदायिनी नर्मदा के बहाव के सर्पिलाकार पथ का संस्पर्श मिलता हो। प्रदेश का मानचित्र होने के बावजूद चाक्षुष रूप से यह एक ऊँचे-नीचे टीले का सा आभास रचेगा।

इस मानचित्र अथवा टीले के मध्य से एक विशाल वट-वृक्ष निर्मित किया जायेगा। वट-वृक्ष की शाखायें ऊपर आकाश (दीर्घा की ऊँची छत) तथा चारों ओर लगे हुए राज्यों की जनजातीय संस्कृतियों (जिनकी झलक दीर्घा की दीवारों पर दिखाई जायेगी) तक फैली होंगी, तो जड़े पृथ्वी (दीर्घा का फर्श) पर फैलेगी। इस विशाल वृक्ष को अनेक माध्यमों का इस्तेमाल करते हुए (मिश्रित माध्यम) बनाया जायेगा, ताकि मजबूती के बावजूद भार अधिक न होता हो और वट-वृक्ष (जो प्रदेश का राजकीय वृक्ष और प्रतीक भी है) की विशालता, उसका वैभव कायम होता हो।

दीर्घा में नीचे मध्य में बने मानचित्र पर मध्यप्रदेश में रहने वाली सभी प्रमुख जनजातियों की भौगोलिक उपस्थिति को सांकेतिक रूप से उनके महत्त्वपूर्ण प्रतीकों केमाध्यम से दर्शाया जायेगा।

दीर्घा की विशालता और ऊँची छत नवाचार करने को पे्ररित करती है तथा इसकी गुंजाइश भी बनाती है। दीर्घा में एकस्थान से सीढिय़ाँ ऊपर की ओर जाकर और फिर समूची दीर्घा के इर्दगिर्द बने रैम्प से जुड़ जायेंगी। दर्शक रैम्प पर चढक़र समूची गैलरी व मध्य स्थित मानचित्र की प्रदक्षिणा कर सकेंगे। पक्षी की नज़र से दिखने वाले विह्ंगम दृश्य का आनन्द ले सकेंगे। खुद संस्कृति रूपी विशाल वट-वृक्ष का हिस्सा होने की अनुभूति प्राप्त कर सकेंगे।

नीचे दीवारों से लगी हुई जगहों पर प्रदेश तथा सीमांचल राज्यों के जनजातीय जीवन और संस्कृति को दर्शाते विविध शिल्प आदि होंगे, जो दोनों के बीच के फर्कऔर समानताओं को एकसाथ देखने-समझने का अवसर प्रदान करेंगे।

दीवार से लगकर नीचे-ऊपर को आती वट-वृक्ष की डगालों से पताकाओं की तरह पड़ौसी राज्यों तथा प्रदेश में पास-पास रहने वाली जनजातियों के जीवन की विशिष्टताओं/समानताओं को दर्शाते छायाचित्र लटके होंगे। इनको पताकाओं अथवा स्क्रोल्स (पटचित्र) के रूप में दर्शाया जायेगा।

संग्रहालय में दीर्घाएँ

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