लोकरंग - 2019

लोकरंग के चौथे दिन बुन्देली और आल्हा गायन रहा आकर्षण का केंद्र (29/01/19)


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लोकरंग के चौथे दिन बुन्देली और आल्हा गायन

आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद् द्वारा संयोजित एवं स्वराज संस्थान संचालनालय दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, नागपुर, उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज, कला एवं संस्कृति विभाग, मणिपुर शासन के सहयोग से गणतंत्र दिवस के अवसर पर जनजातीय और लोक कलाओं के 34वें राष्ट्रीय समारोह 'लोकरंग' के चौथे दिन मध्यप्रदेश के जनजातीय नृत्यों के साथ ही साथ अन्य राज्यों के लोक नृत्यों एवं 'बुन्देली, निमाड़ी और आल्हा गायन' की प्रस्तुतियाँ हुईं|

उल्लास

उल्लास अंतर्गत आज दोपहर 2 बजे से मुदिता भंडारी, इंदौर ने बच्चों को मिट्टी के खिलौने बनाना सिखाया| इस कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों में कल्पना शीलता और कलात्मक प्रतिभा को आगे लाने से रहा| इस कार्यक्रम की खास बात यह रही की बच्चों और अन्य श्रोताओं को हंसी मजाक में ही जीवन के कठिन पथ पर सकारात्मक रहने और आत्मविश्वास से परिपूर्ण होने की प्रेरणा अक्षय भाट ने अपने साथी कलाकारों के साथ दी| मुदिता भंडारी पेशे से शिल्पकार हैं, उन्होंने आज उल्लास के दौरान मिट्टी के खिलौने जैसे जानवर, इमारते और कई खिलौने बनाने सिखाये| बच्चों ने बड़े ही उत्साह के साथ खिलौने बनाना सीखा|

लोकराग-देशराग (मुख्य मंच की प्रस्तुतियाँ)

'लोकराग' अंतर्गत मुक्ताकाश मंच पर शिवरतन यादव ने अपने साथी कलाकारों के साथ 'बुन्देली गायन' प्रस्तुत किया| शिवरतन यादव ने गायन प्रस्तुति की शुरुआत देवी गीत से किया| देवी गीत के पश्चात 'जा नखरे वाली किलो मोहे धनिया' और 'दिन डूबे आ जइयो रे छेला' प्रस्तुत कर सभी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया| शिवरतन यादव ने साथी कलाकारों के साथ 'बड़ी मुश्किल से पाये हमने चार दिना' प्रस्तुत करते हुए अपनी प्रस्तुति को विराम दिया| गायन प्रस्तुति के दौरान शिवरतन यादव का साथ नगड़िया पर प्रेम सिंह यादव ने, ढोलक पर रमेश कुमार ने, तबले पर शिलेन्द्र राजपूत ने और बेन्जो पर विजय बडवानी ने साथ दिया| शिवरतन यादव का साथ गायन में शेलेन्द्र चौरसिया ने दिया|

बुन्देली गायन के बाद शीलू राजपूत ने अपने साथी कलाकारों के साथ 'आल्हा गायन' मुक्ताकाश मंच पर प्रस्तुत किया| शीलू राजपूत ने 'आल्हा गायन' में लायात्मक भाव से 'बड़े लड़ाईया महोबा वाले जिनके बेड वहि तलवार' प्रस्तुत किया| शीलू राजपूत ने अपने गायन कौशल से लाखन और पृथ्वीराज सिंह चौहान के बीच हुई लड़ाई को लायात्मक अंदाज़ से गायन रूप में प्रस्तुत किया| शीलू राजपूत ने लाखन की लड़ाई की कहानी को गाकर सभी दर्शकों और श्रोताओं को अपने गायन से प्रभावित किया| इस प्रस्तुति के दौरान संगतकारों में शीलू राजपूत का साथ बाँसुरी पर सोहन लाल ने, छिका पर पवन कुमार ने, दण्ड ताल पर राज बहादुर ने और ढोलक पर सर्वेश कुमार ने साथ दिया|

आल्हा गायन के बाद विभा शर्मा ने अपने साथी कलाकारों के साथ 'निमाड़ी गायन' गायन प्रस्तुत किया| विभा शर्मा ने अपने गायन की शुरुआत 'ओमकार महाराज तीरथ जाऊँगी' प्रस्तुत कर किया| इसके बाद साथी कलाकारों के साथ विभा शर्मा ने 'नर्मदा का जल मा नहाऊंगा' प्रस्तुत कर सभी श्रोताओं को भाव से भर दिया| इसके बाद विभा शर्मा ने साथी कलाकारों के साथ 'बनमाले रे फूल' गीत प्रस्तुत करते हुए अपनी प्रस्तुति को विराम दिया| इस प्रस्तुति में विभा शर्मा का साथ की-बोर्ड पर लोकेश दुबे ने, तबले पर अनिल विश्वकर्मा ने दिया| विभा शर्मा का साथ प्रस्तुति के दौरान गायन में मोनिका शुक्ला और दीपाली चंद्रमण ने दिया|

धरोहर-देशान्तर (मुख्य मंच की प्रस्तुतियाँ)

आल्हा गायन के बाद अल्जीरिया के कलाकारों ने केन-केन डांस के 'फिगेरिया नृत्य' की प्रस्तुति प्रस्तुत की| केन-केन डांस असल में अत्याधिक उर्जा से परिपूर्ण और बेहद लोकप्रिय नृत्य है| इस नृत्य को स्त्री-पुरुष दोनों ही करते हैं, परन्तु पारम्परिक रूप से यह महिला नृत्य है| इस प्रस्तुति में नतालिया, एलेना सवेलोवा, अल्बीना केरेफोवा, येल्यज़वेता चेर्न्यक और विक्टोरीया अबिदोवा ने अपने नृत्य कौशल से सभी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया|

केन-केन डांस के बाद उज्जैन के कृष्णा वर्मा ने अपने लगभग 16 साथी कलाकारों के साथ 'रिद्ध-सिद्ध गुण से मानवो माता जरणी' गीत पर 'छतरी नृत्य' प्रस्तुत किया| नृत्य प्रस्तुति के दौरान ढोलक पर गगन जौहरी ने, ढोल पर पप्पू चौहान ने और हारमोनियम पर मांगीलालजी वैष्णव ने साथ दिया| प्रस्तुति के दौरान गायन में बाबूलाल भाटी ने सहयोग किया|

छतरी नृत्य के बाद हरियाण की सुनीता हरयाणवी ने लगभग 15 कलाकारों के साथ लोकगीत 'क्यें की पनिहारी मैं घणी दूरता आया' गीत पर 'पनिहारी नृत्य' प्रस्तुत किया| नृत्य प्रस्तुति के दौरान ढोलक पर पंकज ने, हारमोनियम सन्नी ने और नगाड़े पर रघु ने सहयोग किया| प्रस्तुति के दौरान गायन में नितिन कुंडू ने साथ दिया|

पनिहारी नृत्य के बाद केन-केन डांस अल्जीरिया के कलाकारों ने केन-केन डांस के 'डेला ड्रीमर नृत्य' और 'कैबरे नृत्य' की प्रस्तुति प्रस्तुत की| इस प्रस्तुति में नतालिया, एलेना सवेलोवा, अल्बीना केरेफोवा, येल्यज़वेता चेर्न्यक और विक्टोरीया अबिदोवा ने साथ दिया|

केन केन डांस के बाद हरदा के मनसाराम अखंडे ने लगभग 16 साथी कलाकारों के साथ मेला प्रांगण में 'कोरकू गदली' नृत्य प्रस्तुत किया| इस नृत्य में प्रायः ही बाँसुरी और ढोलक की ताल पर नृत्य प्रस्तुत किया जाता है| इस प्रस्तुति में बाँसुरी पर परेश राम और मनसाराम ने, ढोलक पर अनोखे लाल और रामनाथ ने कलाकारों का साथ दिया|

कोरकू गदली के बाद मणिपुर के कलाकारों ने 'मैबी ढोल चालोम नृत्य' प्रस्तुत किया| इस नृत्य को प्रायः की होली उत्सव के दौरान किया जाता है, यह नृत्य भाव से परिपूर्ण होता है| नृत्य प्रस्तुति के दौरान ढोलक पर अनंत सिंह ने और बाँसुरी पर नीलचन्द्र शर्मा ने साथ दिया| इस नृत्य में लगभग 4 कलाकारों ने मंच पर मोहक प्रस्तुति प्रस्तुत की|

मणिपुर के मैबी ढोल चालोम नृत्य के बाद गुजरात के मोहम्मद सिद्धिक ने लगभग 12 कलाकारों के साथ 'बाना है, बाना है' लोक गीत पर 'सिद्धी धमाल नृत्य' प्रस्तुत किया| नृत्य प्रस्तुति के दौरान ढोल पर मौसिन और सादिक ने, तांसा पर नईम ने, धमामा पर अशफाक ने और शंख पर शाहरूख ने सहयोग दिया|

गुजरात के सिद्धी धमाल नृत्य के बाद अल्जीरिया के कलाकारों ने 'कार्निवल ऑफ़ अल्जीरिया' केन्द्रित प्रस्तुति प्रस्तुत करते हुए अपनी प्रस्तुति को विराम दिया| इस प्रस्तुति में नतालिया, एलेना सवेलोवा, अल्बीना केरेफोवा, येल्यज़वेता चेर्न्यक और विक्टोरीया अबिदोवा ने अपने नृत्य कौशल से सभी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया|

मेला प्रांगण में हुईं प्रस्तुतियाँ

मणिपुर के सिनाम सिंह सिन्हा और उनके साथी कलाकारों ने मेला प्रांगण में 'मार्शल आर्ट' की प्रस्तुति दी| इस प्रस्तुति में मणिपुर के पारम्परिक हथियार 'थान्गपक' का भी प्रयोग किया गया, कलाकारों के नृत्य और युद्ध कौशल ने दर्शकों को मोह लिया| इस प्रस्तुति में लंगदंग पर दीपेन्द्र ने, ढोलक पर अनंत सिंह ने और मंजीरे पर नीलचन्द्र शर्मा ने साथ दिया|

मध्यप्रदेश के कलाकारों ने मेला प्रांगण में लोकगीत 'गुमिया मना ले इसी गाम में' पर 'लहंगी नृत्य' प्रस्तुत किया| इस प्रस्तुति का निर्देशन दिवारी लाल ने किया| नृत्य के दौरान ढोल पर छोटे लाल ने साथ दिया| इस प्रस्तुति में लगभग 18 कलाकारों ने प्रस्तुति दी|

छत्तीसगढ़ के घनश्याम ठाकुर ने लगभग 15 कलाकारों के साथ मेला प्रांगण में लोकगीत 'सूरता के सागर में डुबका' पर 'पंथी नृत्य' लोकनृत्य की मनमोहक प्रस्तुति प्रस्तुत की| नृत्य प्रस्तुति के दौरान मांदर पर कुमार ने, टिमकी पर शगुन ने और मंजीरे पर ढोलाराम ने संगत की|

उत्तराखंड के बचन सिंह राणा ने लगभग 16 साथी कलाकारों के साथ मेला प्रांगण में लोकगीत 'कोदेकू कुदुआ' पर 'झेंटा रासो लोकनृत्य' की मोहक प्रस्तुति प्रस्तुत की| नृत्य प्रस्तुति के दौरान ढोल पर हेमा दास ने, दमाऊ पर विशाल वर्मा ने, रणसिंगा पर मनोज वर्मा ने और हारमोनियम पर वीरेंदर वर्मा ने साथ दिया|

तेलंगाना के सुरेश रेड्डी ने लगभग 15 कलाकारों के साथ मेला प्रांगण में 'मथुरी नृत्य' की मोहक प्रस्तुति प्रस्तुत की| इस नृत्य प्रस्तुति में ढपली पर कृष्णा और मंजीरे पर सुरेश ने संगत की|

प्रस्तुति के दौरान कई बार दर्शकों और श्रोताओं ने कलाकारों का उत्साह वर्धन करतल ध्वनि से किया|

समारोह के अंतिम दिन 30 जनवरी को महात्मा गाँधी की पुण्यतिथि के अवसर पर ख्यात सूफी गायक हंसराज हंस अपने साथी कलाकारों के साथ सूफी गायन प्रस्तुत करेंगे|

क्राफ्ट एवं शिल्प प्रदर्शन

लोकरंग में विविध प्रकार के शिल्पों के मेले की एक विशिष्ट पहचान है। इस बार भी देश के विभिन्न रंज्यों से पारम्परिक शिल्पियों को निमंत्रित किया गया है, जो शिल्प मेले में पारम्परिक शिल्पों की बिक्री व प्रदर्शन करेंगे।

स्वाद

लोकरंग के विशाल परिसर में एक आकर्षण व्यंजन मेले का भी है। इस बार भी इसके अन्तर्गत पहले से ज्यादा अर्थात लगभग 18 हुनरमंद पाक कला में माहिर विभिन्न राज्यों के व्यंजनकार अपने व्यंजनों से लुभायेंगे।

उल्लास

इसके अंतर्गत कठपुतली के खेल छोटे बच्चों के लिए उपलब्ध रहेंगे। कविता एवं कहानी लिखने, बोलने और पढ़ने के आत्मविश्वास के लिए सत्र होंगे। खिलौने बनाने का प्रशिक्षण दिया जायेगा एवं इसके अलावा और भी कई छोटे-छोटे आयामों में बच्चों के मनोरंजन, ज्ञान एवं आनंद के उपक्रम किए जायेंगे।


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