पाँचवा वर्षगाँठ समारोह
06 से 10 जून, 2018

मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय की स्थापना का पाँचवा वर्षगाँठ समारोह

06 से 10 जून, 2018


वर्षगाँठ समारोह के समापन अवसर पर हुईं विभिन्न प्रस्तुतियाँ (10/06/18)

मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में जनजातीय जीवन, देशज ज्ञान परम्परा एवं सौन्दर्यबोध पर एकाग्र 'पांचवे वर्षगाँठ समारोह' के समापन अवसर पर हुईं विभिन्न प्रस्तुतियाँ|

वर्षगाँठ समारोह में आज जहानु बरुहा द्वारा निर्देशित बाल फ़िल्म 'तोरा'(वर्ष-2003) का प्रदर्शन संग्रहालय सभागार में हुआ| इस फ़िल्म के केंद्र में तोरा नामक लड़की है, जो अपने माता-पिता के साथ असम के एक गाँव में रहती है| तोरा के घर के करीब ही एक और परिवार रहता है, दोनों ही परिवारों में एक दूसरे के प्रति काफी सहानुभूति है| तोरा गाँव के स्कूल में पढ़ती है| प्रकृति और जीव जंतुओं से उसे काफी लगाव भी है| फ़िल्म में नया मोड़ तब आता है, जब ज़मीन के विवाद के चलते दोनों परिवारों में खटास आ जाती है| अतः विवाद और बढ़ता जाता है| अंत में तोरा के कारण ही जमीनी विवाद शांत होता है और दोनों परिवारों में पुनः सौहार्द लोटता है| इस फ़िल्म के माध्यम से बच्चों के निश्छल भाव और प्रेम व्यव्हार को प्रस्तुत किया गया है| इस फ़िल्म की अवधि लगभग 1 घंटा 55 मिनट रही| इस फ़िल्म में मुख्य भूमिकाओं में अनूप हजारिका, सुकन्या खरगोरिया, अतुल पसोनी अरुणा हजारिका और प्रतिभा चौधरी आदि कलाकारों ने अभिनय किया है| जहानु बरुहा फ़िल्मी जगत की जानी-मानी फ़िल्म फिल्म मेकर हैं| जहानु बरुहा की कई फ़िल्मों को अन्तर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में भी प्रदर्शित किया जा चूका है|

फ़िल्म के पश्चात् 'किस्सागोई' श्रृंखला अंतर्गत देहरादून की बसंती देवी बिष्ट ने गायन शैली में कई किस्से और स्तुतियाँ प्रस्तुत की| बसंत बिष्ट ने अपनी प्रस्तुति की शुरुआत 'मांगल गीत' 'सगन बोल भूमि भुमियाल' से की| यह गीत प्रायः स्त्रियों द्वारा गाया जाता है| गीत में पहला आमंत्रण प्रकृति को दिया जाता है| इस गीत के माध्यम से वासुकी नाग और नारदजी के गाय को नागलोक में खोजने के प्रसंग को प्रस्तुत किया गया| मांगल गीत के बाद माँ भगवती नंदा की स्तुति 'सुफल हवे जाय नंदा तुम्हारी यात्रा' प्रस्तुत की| उत्तराखंड की अराध्य देवी माँ नंदा का सभी भक्त, देव गण और ऋषि वाद्य यंत्र के साथ माँ को विदा कर रहे हैं और माँ भगवती कैलाश पर्वत पर जा रही हैं| स्तुति के बाद 'यमुना नदी की स्तुति' 'स्नेह दायनी तारण हारणी जमुना जी की' प्रस्तुत की| इस स्तुति में माँ यमुना को जीवन दायनी के रूप में प्रस्तुत किया गया| यमुना स्तुति के बाद कुमांऊ का परम्परिक लोक गीत 'मैं ज्वान मेरी हुडुकी बाजी घमा घम' प्रस्तुत किया| जिसमें प्रेम के साथ-साथ मर्यादा का भी ध्यान रखा गया है| इस गीत में प्रस्तुत किया गया की पियसी हो या पत्नी, पुरुष उसे जरुर सम्मान देता है| बसंत बिष्ट ने अंत में आँहरी या परियों के सन्दर्भ में 'न्योतन लाया नौ बेदी आँहरी' बंदिश प्रस्तुत किया| इस प्रस्तुति में बसंत बिष्ट का साथ गायन में अमिता रावत और हेमा बिष्ट ने दिया| संगतकारों में की-बोर्ड पर वीरेंद्र डिमरी ने, ढोलक पर वीरेंद्र पहाड़ी ने और हुड़क पर रणजीत बिष्ट ने अपनी संगत से श्रोताओं को मोह लिया|

किस्सागोई के बाद शीलू राजपूत ने अपने साथी कलाकारों के साथ 'आल्हा गायन' संग्रहालय के मुक्ताकाश मंच पर प्रस्तुत किया| शीलू राजपूत ने 'आल्हा गायन' में उदल और फुलवा के विवाह प्रसंग को गायन शैली 'नरवलगढ़ के जहाँ उदल का होय विवाह' प्रस्तुत किया| इस गायन प्रस्तुति में महोबा के राजा परमाल के कहने पर उदल ढेबा घोड़ा खरीदने के लिये काबुल की ओर जाते हैं, लेकिन नरवल पहुंचकर वहाँ के राजा की पुत्री फुलवा को देखकर विवाह करने का विचार करते हैं| उदल जनाना वेश बनाकर फुलवा को देखने जाते हैं और फुलवा से वादा करते हैं कि तुमसे विवाह अवश्य करूँगा| फिर उदल महोबा आकर फौज सजाकर नरवलगढ़ पर चढ़ाई करते हैं| वहाँ घमासान युद्ध होता है, लेकिन उदल की विजय होती है और राजा उदल और फुलवा का विवाह ख़ुशी-ख़ुशी कर देते हैं| इस प्रस्तुति के दौरान संगतकारों में शीलू राजपूत का साथ बाँसुरी पर राम अवध ने, छिका पर पवन कुमार ने, दण्ड ताल पर राज बहादुर ने, मंजीरे पर अनिल कुमार ने और ढोलक पर वासुदेव ने साथ दिया|

आल्हा गायन के बाद असम के कलाकारों ने 'बोहाग बिहू' नृत्य और मेघालय के कलाकारों 'रुगाला' नृत्य संग्रहालय के मुक्ताकाश मंच पर प्रस्तुत किया| असम के कलाकारों ने जब परंपरागत पोशाक पहनकर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर खूबसूरत 'बोहाग बीहू' नृत्य प्रस्तुत किया तो सभी दर्शकों के पैर थिरक उठे। बोहाग बिहू, भारत के असम और उत्तर-पूर्वी राज्यों में मनाया जाने वाला एक प्रसिद्ध त्यौहार है। इसे 'रोंगाली बिहू' या हतबिहू भी कहते हैं। यह असमी नव वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है। मंच पर असम से आये कलाकारों में अभिजीत, रिम्पी, पूजा, गौतम और उत्पल सहित लगभग 20 कलाकारों ने मंच पर नृत्य प्रस्तुत किया|

मेघालय से आये कलाकारों ने अंत में 'रुगाला' नृत्य प्रस्तुत किया| यह नृत्य फसल की कटाई के बाद उत्सव के रूप में किया जाता है| 'रुगाला' मेघालय का लोक नृत्य है| इस नृत्य शैली में जानवरों और कृषि सम्बन्धी कार्यों को प्रायः प्रस्तुत किया जाता है| मंच पर मेघालय से आये कलाकारों में लिजा, राहुल, ईस्टर, एंडी और चिंदु सहित लगभग 20 कलाकारों ने मंच पर नृत्य प्रस्तुत किया|

प्रस्तुतियों के दौरान कलाकारों का उत्साहवर्धन दर्शकों और श्रोताओं ने करतल ध्वनि से किया|

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